Oct 19, 2019
ब्रह्मचर्य - प्रेम और हमारा तन
ब्रह्मचर्य आधुनिक समय में हास्यपद सा प्रतीत होने वाला शब्द मात्र बनकर रह गया है साथ ही साथ ब्रह्मचारी को मुर्ख या अर्थहीन जीवन जीने वाला व्यक्ति से बढ़कर कुछ नहीं समझा जाता है | ब्रह्मचर्य में स्त्री स्पर्श अथवा पुरुष स्पर्श को सर्वथा अनुचित कहा जाता है | एक ब्रह्मचारी को स्त्री स्पर्श या पुरुष स्पर्श से सदैव दूर रहने का कठोर आदेश है ( माता या पिता के सन्दर्भ में नहीं ) |
वर्तमान समय में इसे संकीर्ण मानसिकता या कुंठित मानसिकता ठहराया जाता है | ऐसा शायद इस लिए हो रहा है क्यूंकि लोग ब्रह्मचर्य के इस रहस्य को भूल चुके है और साथ ही साथ समझते नहीं या समझना नहीं चाहते |
वर्तमान समय में ज्यादातर लोग ब्रह्मचारीको आनंदहीन और अर्थहीन जीवन जीने वाला व्यक्ति ही मानते हैं | जबकि वास्तविक सच्चाई ठीक इसके उलट है | ब्रह्मचर्य के इस तथ्य को समाज में विस्मृत किया जा चूका है | वास्तव में ब्रह्मचर्य में इस तथ्य का वैज्ञानिक आयाम और परिप्येक्ष्य है |
हमारे के शरीर पांचो ज्ञान्नेंद्रियों के पास स्वयं की स्मृति या यादाश्त होती है | जो सभी प्रकार के अनुभवों को संचय करती रहती है | उदहारण के लिए जब आप एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाते हैं तो हमारा नाक सभी प्रकार के गंध का विश्लेषण करता रहता है की कौन सी गंध सुगंध है और कौन सी गंध दुर्गन्ध है और आप जब कभी भी उसी प्रकार के गंध को महसूस करते हैं तो उसकी पहचान तत्काल कर लेते हैं , बिना किसी देर के और बिना इस बात को जाने क्यूंकि वह गंध आपके अवचेतन मन के स्मृति पटल पर संचित हो जाता है |
ठीक उसी तरह हमारे तन या शरीर भी स्मृतियों का संचयन करता रहता है बिना आपके जानकारी के ये सब स्मृतियाँ संचित होती रहती हैं | उदहारण के लिए आप अपने माँ के स्पर्श को जानते है और आप चाहे तो इसके लिए प्रयोग भी कर सकते हैं | इसके लिए आप अपने किसी मित्र के हाथ को सिर्फ स्पर्श करें प्रतिदिन और कुछ दिनों बाद ही उस मित्र के स्पर्श को आप बिना देखे पहचान सकते है की यह स्पर्श उसी मित्र का है | स्पर्श के द्वारा अनुभवों और अहसासों का आदान - प्रदान भी होता है बिना आपके जानकारी के , जैसे आप किसी के उदासी का पता उसके ठन्डे हांथो को छूकर और किसी के बुखार का पता उसके गर्म हाथों को छूकर कर सकते हैं | जब कोई व्यक्ति प्यारवश किसी व्यक्ति के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करता है तो अनुभवों और स्मृतियों का आदान प्रदान उच्च स्तर पर होता है | यही वजह है की कई लोगों से सम्बन्ध रखने वाले लोगों को विश्मरण - परेशानी - उलझन ज्यादा होती है क्यूंकि उसने अनजाने में कितनी ही स्मृतियों और अहसासों का संचयन कर लिया है | जबकि एक ब्रह्मचारी स्पष्ट - समझदार - सुलझा - ईमानदार व्यक्ति होता है | अब आप ये सोचिये की हमारा शरीर कितनी महान रचना है |
ब्रह्मचर्य जीवन में व्यक्ति स्वयं का अन्वेषणऔर परिष्करण करता है | जिससे वह आने वाला जीवन नवनिर्माण में लगा सके | उसे स्वयं के अनुभवों को औरो के अनुभवों से ज्यादा समझना होता है | उसे स्वयं की तलाश पूरी करनी होती है | जिससे उसका भावी जीवन शांतिपूर्ण हो | इस तथ्य के महत्वों को समझते हुए हमारे महान ऋषियों ने ब्रह्मचर्य में कठोर नियमों के अनुपालन पर जोर दिया |
- आकाश आर्यावर्त
वर्तमान समय में इसे संकीर्ण मानसिकता या कुंठित मानसिकता ठहराया जाता है | ऐसा शायद इस लिए हो रहा है क्यूंकि लोग ब्रह्मचर्य के इस रहस्य को भूल चुके है और साथ ही साथ समझते नहीं या समझना नहीं चाहते |
वर्तमान समय में ज्यादातर लोग ब्रह्मचारीको आनंदहीन और अर्थहीन जीवन जीने वाला व्यक्ति ही मानते हैं | जबकि वास्तविक सच्चाई ठीक इसके उलट है | ब्रह्मचर्य के इस तथ्य को समाज में विस्मृत किया जा चूका है | वास्तव में ब्रह्मचर्य में इस तथ्य का वैज्ञानिक आयाम और परिप्येक्ष्य है |
हमारे के शरीर पांचो ज्ञान्नेंद्रियों के पास स्वयं की स्मृति या यादाश्त होती है | जो सभी प्रकार के अनुभवों को संचय करती रहती है | उदहारण के लिए जब आप एक स्थान से दुसरे स्थान पर जाते हैं तो हमारा नाक सभी प्रकार के गंध का विश्लेषण करता रहता है की कौन सी गंध सुगंध है और कौन सी गंध दुर्गन्ध है और आप जब कभी भी उसी प्रकार के गंध को महसूस करते हैं तो उसकी पहचान तत्काल कर लेते हैं , बिना किसी देर के और बिना इस बात को जाने क्यूंकि वह गंध आपके अवचेतन मन के स्मृति पटल पर संचित हो जाता है |
ठीक उसी तरह हमारे तन या शरीर भी स्मृतियों का संचयन करता रहता है बिना आपके जानकारी के ये सब स्मृतियाँ संचित होती रहती हैं | उदहारण के लिए आप अपने माँ के स्पर्श को जानते है और आप चाहे तो इसके लिए प्रयोग भी कर सकते हैं | इसके लिए आप अपने किसी मित्र के हाथ को सिर्फ स्पर्श करें प्रतिदिन और कुछ दिनों बाद ही उस मित्र के स्पर्श को आप बिना देखे पहचान सकते है की यह स्पर्श उसी मित्र का है | स्पर्श के द्वारा अनुभवों और अहसासों का आदान - प्रदान भी होता है बिना आपके जानकारी के , जैसे आप किसी के उदासी का पता उसके ठन्डे हांथो को छूकर और किसी के बुखार का पता उसके गर्म हाथों को छूकर कर सकते हैं | जब कोई व्यक्ति प्यारवश किसी व्यक्ति के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करता है तो अनुभवों और स्मृतियों का आदान प्रदान उच्च स्तर पर होता है | यही वजह है की कई लोगों से सम्बन्ध रखने वाले लोगों को विश्मरण - परेशानी - उलझन ज्यादा होती है क्यूंकि उसने अनजाने में कितनी ही स्मृतियों और अहसासों का संचयन कर लिया है | जबकि एक ब्रह्मचारी स्पष्ट - समझदार - सुलझा - ईमानदार व्यक्ति होता है | अब आप ये सोचिये की हमारा शरीर कितनी महान रचना है |
ब्रह्मचर्य जीवन में व्यक्ति स्वयं का अन्वेषणऔर परिष्करण करता है | जिससे वह आने वाला जीवन नवनिर्माण में लगा सके | उसे स्वयं के अनुभवों को औरो के अनुभवों से ज्यादा समझना होता है | उसे स्वयं की तलाश पूरी करनी होती है | जिससे उसका भावी जीवन शांतिपूर्ण हो | इस तथ्य के महत्वों को समझते हुए हमारे महान ऋषियों ने ब्रह्मचर्य में कठोर नियमों के अनुपालन पर जोर दिया |
- आकाश आर्यावर्त