Dec 21, 2020
वयोवृद्ध मित्र ( Aged Friend )
वैसे तो हम अपने उम्र के लोगों से कम ही बात करते हैं
क्योंकि आजकल के युवाओं को बात करने के लिए अनर्गल - व्यर्थ बातचीत के अलावा उनके पास कुछ होता नहीं है | वैसे सच कहा जाये तो बचपन से ही हम अपने से ज्यादा उम्र के लोगों के साथ उठा - बैठा करते थे ......खेलने की बात और है
शायद जब हम ६ वी कक्षा में थे तभी हमारे हाथ किसी के घर से चाणक्य निति हाथ लग गयी थी ......हाथ लग गयी थी मतलब हमने उसे गायब कर दिया था | उसमें लिखा था की अपने से ज्यादा अनुभवी और ज्ञानी एक मित्र अवश्य होना चाहिए |
वैसे गाँव हमारे मुह्बोले खानदान का बसाया हुआ है....१८५७ सवरू सिंह पटेल ......हवेली पर यही लिखा हुआ है
उससे पुराना कोई घर आस - पास नहीं है कहीं भी और सबसे ज्यादा जमीन भी कभी इसी खानदान के पास हुआ करती थी | वैसे नाम का ही खानदान है मतलब कुछ है नहीं |
शायद १८५७ की क्रांति के बाद बचे हुए मराठों का गाँव है ये |
तो अपने खानदान में से पुस्तकों का हिसाब तो बना लेते थे लेकिन ज्ञानी तो हमें कोई नहीं लगता था |
शौभाग्य से एक दिन हमारे यहाँ एकादशी कथा के दिन हमारे जो कुल पुरोहित हैं वो कहीं और कथा करने गए हुए थे |
हमें भेजा गया जाओ जाकर किसी और को देखो और बुला लाओ |
वैसे गाँव में सब अलग - अलग कुल के अलग - अलग कुल पुरोहित हैं | कोई दूसरा कुल पुरोहित दुसरे कुल में कथा नहीं करता | ( यह बचपन की बात है तब हमें यह सब ढंग से समझ नहीं आता था )
हम दुसरे कुल पुरोहित के यहाँ गए तो उसने साफ़ मना कर दिया की तुम्हारे यहाँ तो फलां कुल का पुरोहित कथा कहता है |
तीसरे के यहाँ गया तो हमने इस बार थोडा बात बदल कर की ......हमने पहले हाल - चाल पूछा और थोड़े बहोत जो गायत्री मन्त्र - महामृत्यंजय मन्त्र और एकाध वेद की ऋचा सुना दी .....फिर धीरे से अपनी बात रख दी की कथा है अगर कह दे तो कल्याण हो जाये
अब पंडित जी शायद प्रभावित हो गए या जो उनका अपना कोई और विचार रहा हो ....वो कथा कहने के लिए तैयार हो गए
घर आये कुलदेव श्री नारायण भगवान की कथा हुयी और फिर वृद्ध होने के वजह से घर वालों से पंडित जी ने दान -दक्षिणा घर तक पहुचाने के लिए घर वालों से निवेदन किया की आकाश को साथ भेज दें तो बहोत अच्छा होगा |
घर पहुचाने पर बहुत लम्बी बात चली हमारी उनके साथ |
कई बिंदु पर बात हुयी ....
कुछ पुस्तकों का भी हिसाब बन गया जो की हमारे लिए सोने पर सुहागा वाली बात थी .....और कुछ पुस्तकें उनके घर में दिख भी गयी थी......बाकि आप समझ सकते हो |
उसके बाद से जब भी रास्ते में कहीं हम दिख जाते हमारी रास्ते पर ही घंटों बात होती | हमें कोई और उतना ज्ञानी तो दिखा नहीं इसलिए उनसे ही बातों का घुमा फिराकर उत्तर ले लिया करते थे |
लेकिन दसवीं कक्षा के बाद उन्हें लगभग भूल ही गया | क्योंकि उसके बाद हम घर पर कभी रहे नहीं ज्यादा समय |
अभी कुछ दिनों पहले उनका हमारे घर आना हुआ ....
हमें यह पता चला की उन्हें अब चलने में भी समस्या होने लगी है | घुटनों में और हाथ के पंजे में सुजन आ चुकी है | उन्होंने हमसे न मिलने आने की शिकायत भी की | हमने उन्हें अपने तरफ से दवा दी मालिश करने के लिए और कुछ सलाह भी | उन्हें समझाना पड़ा की हम अब हमेशा घर नहीं रहते |
उनकी हमसे भी शिकायत थी की कभी हाल - चाल नहीं पूछते !
कभी आते नहीं !
जिंदगी का अब कोई भरोसा नहीं !
हम तो तुम्हे दोस्त की तरह समझते थे !
वगैरह ...वगैरह
वैसे दिए हुए दवा से थोडा आराम हो गया है ....चलने में कम समस्या होती है अब
वैसे सच कहा जाये तो ये अपने वयोवृद्ध मित्र ही हैं जिन्होंने हमें अपने अनुभव - ज्ञान को बाल्यकाल में ही दिया था | साथ खेले तो नहीं लेकिन स्वध्याय के लिए पुस्तकें बहुत दी | बचपन के मित्र - मार्गदर्शक हैं तो सम्मान - स्नेह ह्रदय में सदैव ही रहेगा |
- आकाश आर्यावर्त



