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Jan 22, 2021

परमात्मा और आत्मा

गीता - वेद - पुराण - उपनिषद में कहा गया है 

" हर कण व् जीव में आत्मा का वास है "

अतः हर जीव को हमारे धर्म में सम्मान व् आदर भाव से देखा गया है |

जब मनुष्य सहज भाव से जन्म लेता है व् विकसित होता है तो वह स्वतः परमात्मा होता | उसके मन में छल - कपट - द्वेष - मिथ्या जरा भी नहीं होता |

जब आत्मा विशुद्ध होती है तो मनुष्य एक असत्य भी नहीं बोलता | उसकी जिह्वा कांपने लगती है | क्योंकि उसके तन में जो आत्मा है वह ही परमात्मा है और परमात्मा सदैव पवित्र - पूजनीय है | ऐसा मनुष्य स्वयं परमात्मा है जिसकी आत्मा पवित्र है |

जब हम कोई गलत कार्य करते हैं तो आत्मा से एक आवाज आती है 

" यह मत कर "

यही आत्मा में परमात्मा की आवाज है  |


जब पहली बार कोई गलत कार्य करता है तो यह यह परमात्मा की शक्ति उसे रोकती है | चाहे वह असत्य बोलना हो - जीव हत्या हो - व्यसन करना हो - छल करना हो - वासना में वशीभूत होना हो - पाप में लिप्त होना हो |


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किन्तु जब बारम्बार असत्य - पाप युक्त कार्य किये जाते हैं तो यह परमात्मा मानव के आत्मा से पृथक हो जाती है |

उसे अपने असत्य - पाप - नीचता में कोई दोष नहीं दिखाई देता है |

जिस व्यक्ति के आत्मा में से परमात्मा का अंत हो चूका हो वह मानवता के लिए अभिशप्त हो जाता है |

वह व्यक्ति असत्यवादी - पापी - नीच - व्यसनी बन असुर बन जाता है |

जिस सीमा तक मानव शरीर में परमात्म अंश जीवित है वह उस सीमा तक मनुष्य है |


एक बार परमात्म अंश के पूर्णतः मृत हो जाने पर इसका उत्थान असंभव है | जब तक कोई परमात्म अंश से पूर्ण व्यक्ति अपने तरंग प्रवाह से देवांश को स्थापित न करे | ( बाल्मीकि - रत्नाकर की कथा में रत्नाकर को दिव्य ज्ञान सप्त ऋषियों द्वारा इसी तरंग प्रवाह से स्थापित कर उसकी आत्मा में परमात्म तत्व का पुनर्स्थापन किया गया था )




सामान्य जीवन में इन पापियों - दुराचारियों - व्यव्सनियों से दूर रहने में ही भलाई है | क्यूंकि इनके अन्दर अहंकार - पशुता - वासना वैसे ही टपकती  रहती है जैसे पागल  कुत्ते के मुह से लार | 

प्रतिकार या आक्रमण इनका तभी करें जब ये मर्यादा की सीमा को लाँघ जाएँ | 


- आकाश आर्यावर्त