निःस्वार्थ पवित्र प्रेम भाव
प्रेम किसी को करना लेकिन ,
कह कर उसे बताना क्या !
स्वयं को कर देना अर्पण ,
किन्तु और को अपनाना क्या !
गुण का ग्राहक बनना किन्तु ,
गा कर उसे सुनना क्या !
मन के कल्पित पवित्र भावों से
औरो को भ्रम में लाना क्या !
ले लेना सुगंध प्रेम -सुमन की ,
तोड़ उन्हें मुरझाना क्या !
प्रेम से सर्वस्व करना समर्पित ,
किन्तु प्रेम पाश फैलाना क्या !
त्याग अंक से पोषित यह प्रेम ह्रदय ,
अब उसमे स्वार्थ बताना क्या !
दे कर ह्रदय , ह्रदय पाने की
आशा व्यर्थ लगाना क्या !
-आकाश आर्यावर्त