Oct 9, 2020
प्रेम - ब्रह्मचर्य - राष्ट्र
प्रेम प्रक्रति का मानव भावनाओं के लिए सर्वोत्तम उपहार है | प्रेम का तात्पर्य आनंद से है | जब मानव किसी पुष्प - झरने - व्यक्ति - पशु या उसके क्रियाकलापों को देखकर आनंद की अनुभूति करता है तो वह उस तत्व अथवा जीव हेतु प्रेम भावना में लिप्त हो जाता है | प्रेम का अर्थ प्रसन्नता है चाहे वह किसी को देखकर प्राप्त हो - स्पर्श कर प्राप्त हो -बात कर प्राप्त हो या चाहे जो भी हो किन्तु हर तौर पर वह प्रसन्नता ही होता है |
किन्तु वास्तविक प्रेम क्या ?
क्या यह अन्य जीव या अन्य बाहरी घटक पर निर्भर करती है या इसका सम्बन्ध आपके स्वयं के अस्तित्व से है ?
जब आप प्रेम किसी बाहरी अस्तित्व ( किसी अन्य व्यक्ति - जानवर या अन्य घटक ) से करते हैं तो यह प्रारम्भ में सुख होता है किन्तु थोड़े समय उपरांत एक विकट समस्या का रूप ले लेता है क्यूंकि जो प्रेम भावना को जागृत करने की चाभी या कुंजी आपके पास होती है उसके अपने शरीर होते है - अपने विचार होते हैं - अपने भाव होते है - अपनी इच्छाए होती हैं | आप जब ऐसे प्रेम की चाभी को अपने अनुसार रखना चाहते हैं तो दो जिंदगियों पर खतरा मंडराने लगता है | परतंत्रता या गुलामी का भयानक खतरा !
वास्तव में प्रेम का तो किसी बाहरी घटक ( व्यक्ति - जानवर - वस्तु इत्यादि ) से कोई भी सम्बन्ध नहीं है | प्रेम का सम्बन्ध आपका स्वयं से है | जब आपको प्रसन्नता अर्थात प्रेम को स्वयं से जोड़ने की कला व् तकनीक ( कुण्डलनी योग ) समझ आ जाती है तो आप प्रेम के लिए किसी बाहरी स्त्रोत -संसाधन के आधीन या गुलाम नहीं रह जाते |
प्रेमपूर्ण व्यक्तित्व अर्थात आप बैठे है और आप प्रसन्न हैं
प्रेम का वास्तविक ज्ञान -अनुभूति हो जाने पर आप खिलते पुष्प से प्रेम कर सकते हैं , बहती हवा की अनुभूति से प्रेम कर सकते हैं , बहते जल से प्रेम कर सकते हैं , किसी की सफलता से प्रेम कर सकते है , किसी के गुण से प्रेम कर सकते हैं , किसी के रचनात्मकता से प्रेम कर सकते है |
यही प्रेम अनुभूति वास्तविक और सत्य प्रेम है..........स्वतंत्र - पवित्र - उन्मुक्त
आधुनिक युग में प्राचीन गुरुकुल परम्परा के अंत हो जाने से लोग प्रेम व् सम्बन्ध के अंतर को भी नहीं समझ पा रहे हैं | गुरुकुल में इस प्रेम भाव -अनुभूति को स्वस्तित्व से जोड़ने की की तकनीक - विधा - ज्ञान (कुण्डलिनी योग ) दिया जाता था जिससे व्यक्ति सदैव प्रसन्नचित - उच्च चरित्र के साथ जीवन जीने की विधा को सिख जाता था | जिससे समाज में सदाचार - नैतिक मूल्यों का प्रभाव था और सर्व समाज प्रसन्न था |
"सम्बन्ध वह है जो व्यक्ति से व्यक्ति का जुडाव करती है "
सम्बन्ध चाहे माता - पिता - भाई - बहन - पति -पत्नी आदि किसी का भी हो वहा प्रेम होना आवश्यक है किन्तु प्रेम किसी सम्बन्ध पर निर्भर नहीं है |
" प्रेम अर्थात आनंद एक सर्वभौमिक - स्वतंत्र - उन्मुक्त भाव है जबकि सम्बन्ध व्यक्ति का व्यक्ति से जुडाव है "
जब व्यक्ति सम्बन्ध को ही प्रेम मान लेता है तो वह संकटों - मानसिक व्यथा - कष्ट आदि से घिर जाता है |
वर्तमान समय में आधुनिक जीवनधारा में बहकर व् पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होकर नवयुवक -नवयुवतिया दैहिक वासना की तृप्ति को प्रेम का नाम दे दिया है जो की हमारी महान संस्कृति व् ज्ञान का घोर अपमान है | दैहिक वासना की तृप्ति से मिलने वाले क्षणिक सुख-आनंद को मुर्ख युवक -युवतियों ने प्रेम समझ लिया है और मान लिया है | इस प्रकार के दैहिक वासना आधारित प्रेम में पडकर जाने कितने नवयुवक -नवयुवती अपने जीवन को नरक व् अन्धकार की ओर ले जा रहे हैं | ब्रह्मचर्य पालन व् उसके महान रहस्यों के ज्ञान -मार्गदर्शन के आभाव में ब्रह्मचर्य विधा -ज्ञान - परम्परा का लोप हो गया है और होता जा रहा है |
नवयुवक - नवयुवतिया सही शिक्षा - मार्गदर्शन के आभाव में अपने जीवन - समय - साधन का नाश कर रहें हैं | समाज में अनाचार -अनैतिकता -पाप फैलता जा रहा है क्यूंकि हमारी गुरुकुल शिक्षा पद्धति का नाश मुगलों - अंग्रेजों द्वारा चरणबद्ध रूप से किया जा चूका है |
वर्तमान शिक्षा प्रणाली पेट-धन के लिए है न की आत्मविकाश - शांति - सदाचार- राष्ट्रोत्थान - धर्मोत्थान -आत्मोत्थान के लिए.........जब शिक्षा का आधार ही स्वार्थपूर्ण है तो हम कहाँ से सदाचारी - महान - समृद्ध समाज-राष्ट्र की स्थापना कर पाएंगे |
- आकाश आर्यावर्त