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Oct 26, 2020

व्यंग संस्मरण - १

 कुछ लोग प्रचण्ड टाइप के लतखोर होते हैं, उनसे मेरा कोई सरोकार नहीं न उनपर ध्यान जाता है

लेकिन एक दूसरी श्रेणी होती है लतखोर लोगों की जिनका पेट नहीं भरता जब तक लात न खा लें

एक साथी था कुणाल !


ऐसा ही था......खासियत ऐसी कि मोक्ष को प्राप्त कर चुके भगवान बुद्ध से भी मिलता तो उनसे भी लात उठवा लेता अपने ऊपर |

उदाहरण के तौर पर कुछ बातें ........

जैसे ही उसके बड़े भैय्या पीसीएस का पेपर देके आए..

कुणाल - भैया पेपर कइसन भयल,

भईया --बढ़िया भयल बे इ बार निकाल लेवे के हव ..

कुणाल -- बढ़िया तोहार हर बार होला, निकली नाही ..

फिर क्या पूछना दे लप्पड़ - दे लप्पड़ और पीठ में एक हूरा देके भगा दिए भाई साहब..


साथ एक बार सिगरा पर घूम रहा था और स्टेडियम के बाहर दो तीन पहलवान नुमा छात्रों को देखा ..

मैंने भी देखा और कहा - देख बे मस्त बॉडी बिल्डिंग कईले हव ..


उनके पास से गुज़रते हुए उनको देख के बोला-- देह अपने काम आई, हमसे का ..हमसे कउनो जने कुछ बोलिहन त पेल देब ..कसम से मैंने भांपते ही फासला बढ़ा लिया था ..( क्यूंकि एक बार उसके लिए लड़ जाते तो फिर हर जगह फालतू लड़ता फिरता )

एक पहलवान बोला--का बोलत हउवे बे जोर से बोल..हमसे बोलत हउवे का ?

और फिर तो कुणाल शुरू --आँख का देखावत हउवे ..मोटा हउवे त डेरा जाइब का ?

फिर ज्यादा याद नहीं है बस ये था कि लात खाया वहां भी ..


ऐसे ही एक बार लड़के बता रहे थे कि कोचिंग में सबसे ज्यादा लतखोर वही था अपने बैच में ,

वो वैसे अपने में अलग ही था ..

एक बार बड़े सर ने बोला - बच्चू कुछ मुंह में है क्या ?
कुणाल - कुछ नहीं सर ..

बड़े सर --मुंह खोल

उसने खोल के दिखाया, कुछ नहीं था ..

फिर कोई और होता तो आराम से बैठ जाता ,लेकिन वो बैठते हुए कुछ भुनभुनाया

बड़े सर ने फिर खड़ा किया -- क्या कह रहा है बच्चू ?

उसने कहा --सर रोहितवा के कहने पर सुर्ती टेस्ट किये थे उसी लिए बार बार थूक बन रहा है मुंह में ...

कसम से पूरी क्लास को बीस मिनट तक आराम रहा और उसको भिन्न भिन्न तरीकों से लतियाया गया ..ऐसा ज़बर का लतखोर आदमी मिलता कहाँ है




ऐसे ही एकबार अस्सीघाट पर लोगों से मिलना जुलना हुआ , साथ में सब लोग घूम रहे थे

कभी गंगा जी के किनारे घाट पर तो कभी रेत पर | फिर ये हुआ की थोडा बाजार में भी घूम - फिर लिया जाए |

सभी लोग बाजार घूम रहे थे और मलइयो - लस्सी की दूकान ख़ोज रहे थे


ऐसे में साथ ही के किसी ने किसी दूकान से उठाकर एक - दो नहीं आठ बर्फी उठा कर मुंह में भर ली और हम सभी लोगों को अपना यह नौटंकी रोड पर ही दिखाने लगा |

किसी को भी ये अच्छा नहीं लगा लेकिन तब तक दुकानदार ने देख लिया था और उसको उसके पराक्रम वाले निशानी के साथ यानि मुंह में आठ बर्फी के साथ धर लिया और हल्ला करने लगा की यही रोज हमारी मिठाई चुराता है , यह देखकर बाकी के दुकानदार भी इकठ्ठा होने लगे

बर्फी भी मुहं में की नहीं खा पाया था बेचारा ........लात-मुक्के खाने लगा

बाकी हम सभी लोग बात करके मामला शांत कर ही रहे थे की .......कुणाल ने एक मोटे आदमी को कसके पीछे से पकड़ लिया

हलवाई गरमा के पूछा - तु कउन हौवे रे !

कुणाल - एकर दोस्त हई बुजरो वाले

एक तो रोज-रोज चोरी और ऊपर से गर्मी फिर पीछे से पकडे हुए कुणाल भईया .......का यह मधुर वचन

पुरे भीड़ का ध्यान अब आठ बर्फी एक बार में मुह में ठूस लेने वाले वीर से कुणाल भईया की तरफ चला गया

वहाँ भी तबियत से कूटे गए .......लोग बताते हैं की उनको कुटा कम गया था लथेरा ज्यादा गया था यानि की घसीटा ज्यादा गया था .....वो भी शहर के गाय वाले गोबर में


- आकाश आर्यावर्त