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Oct 25, 2020

वीर युग नायक ( Biographical Poem )

 भला कब बिना दाहक अग्नि से तपे  , कोई  स्वर्ण  प्रखर  होता है 

भला कब बिना मृत्युतुल्य  दाब झेले , कोई पत्थर हिरा होता है  

भला कब  बिना चोट झेले पत्थर  , कोई मूरत होता है 

भला कब बिना अंधकार के , कोई पौधा विकसित होता है 

भला कब बिना मृत्युतुल्य संघर्ष के , कोई वीर महानायक होता है   


 

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प्रक्रति के प्रक्रिया से कहाँ कोई स्वतंत्र रहा है !

वीर का जीवन भी भला कभी सुखी - प्रसन्न रहा है ,


समय के आघात जब उसके स्वप्न हर लेती हैं , जीवन पथ के कंटक जब पग छलनी कर देती हैं

तब भी वीर को विजय हुंकार लगाना पड़ता है , भाग्य को भी अपने पुरुषार्थ से अंकुश में लाना पड़ता है 


वीर  तो संघर्षो में ही  आनंद पाता है , विपदा देख मुस्कुराता है  

जब मृत्य पास आती है , वह भी उसको लोरी ही  सुनाती है 


म्रत्यु की शैया पर भी वह विजय हुंकार लगता है , 

होकर निर्भीक वह म्रत्यु से भी आंख से आंख मिलाता है ,

म्रत्यु में भी  वीर  अग्र जीवन का उत्थान ही पाता  है ,


मृत्य जब आती है , कायर को ही दहलाती है 

वीर कभी नहीं विचलित होते , ना कभी धर्य -धीरज खोते 


मृत्यतुल्य कष्ट मार्ग को भी वो हँसकर गले लगाते हैं ,

नर्क से दुष्कर पथ पर भी वो अपनी राह बनाते हैं ,

वेदना - पीड़ा में भी वो मुख पर गरिमा ही रखते हैं ,

स्व जीवन की विपत्तियों पर भी हँसते हैं ,


पत्थर जब सहता है प्रहार , तब वह बनता है मंदिर का श्रृंगार 


इस धरा पर अतुलित यश का किसने मान किया है  ?

इस ब्रह्माण्ड में  धर्म का किसने उत्थान किया  है ?


जिस किसी ने भी विघ्नों में ना स्वयं को विराम दिया , दुष्कर कष्टों में भी रहकर स्वयं का उत्थान किया 


विपदाए जब आती है , उनको नया ज्ञान दे जाती हैं 

आघात -विपदा और  षडयंत्र  , व्यक्तित्व निर्माण के हैं साधन अखंड 


उपवन में  मिला करते हैं भला सिंह  कभी  , और वन में कहाँ पोषण कभी 


जहां आम-जन-मानस वंशागत धन - संपदा पाते हैं , वहां वो  स्वपुरुषार्थ से राज्य नहीं  साम्राज्य बनातें है 

विपदाएं जिनके महत्वकांक्षा का पोषण करती हैं  , जीवन  आघात ही  जिनका चरित्र गढ़ती हैं 


हे वीर  !


जीवन से प्रेम - स्नेह का रस छान जाने दे , कर्म पथ पर मन पत्थर का बन जाने दे 

तेरी महत्वकांक्षा स्वयं तेज - भयकारी है , क्या कर सकती मृत्यु की चिंगारी है 

जो महत्वाकांक्षा की सत्य-अग्नि है , मृत्यु सम्मुख भी नहीं बुझानी है 

जो महत्वकांक्षा की अग्नि में जलते हैं , वो ही वीर  युग नायक बनकर निकलते हैं 


अनाचार जब कुचल रहा सदाचार को ,

स्वार्थ जब बढ़ रहा आगे , प्रक्रति के विनाश को 

अधर्म जब उन्मत्त है , धर्म के विनाश को 

वासना जब नष्ट कर रही , संयम - ब्रह्मचर्य  के आधार को 

ब्रह्माण्ड जब प्रतीक्षा कर रहा , कल्कि अवतार को 


ना करो प्रतीक्षा तुम , आने वाले नववातार को 

स्वयं तुम धर्म का उत्थान  बनो ,

संयम-ब्रह्मचर्य  का तुम स्व प्रमाण बनो ,

निःस्वार्थ सृजन का तुम स्वयं भाव बनो ,

विज्ञान का ज्ञान बनो ,

वीरता के खड्ग का तीव्र तुम धार बनो ,

आरती की लौ नहीं , स्त्यागनी का तुम मशाल बनो 

मृत्युतुल्य  संघर्ष पथ पर चलकर तुम , इस कलयुग के अंत का यमराज बनो 

कलयुग - सतयुग की इस  संधिबेला में ,  स्वयं कल्कि अवतार बनो 




- आकाश आर्यावर्त