Followers

Nov 1, 2020

हाँ , मैं मणिकर्णिका शमशान बैठ आता हूँ ( Poem on Truthiness of Life )

जब ह्रदय में मान - अपमान का भाव जगे ,

तब इस ह्रदय में जगे मान  - अपमान  को जला आता हूँ ,

हाँ , मैं मणिकर्णिका शमशान बैठ आता हूँ 


जब जीवन व्  ह्रदय में कष्ट घनीभूत हो जाये ,

जलती चिता को देखकर वही कष्ट के  आंशु गिरा आता हूँ  ,

हाँ , मैं मणिकर्णिका शमशान बैठ आता हूँ 


जब भी मिली सफलता जीवन में ,

उस  सफलता के अहंकार के  उठने से पहले उसे मार आता हूँ ,

 हाँ , मैं मणिकर्णिका शमशान बैठ आता हूँ 


आकाश आर्यावर्त , akash , akash aryavart ,akash ,akas , truth of life , death , death poetry , truthiness of life



जब भी हुआ तन के सुन्दरता का भान ,

उस सुन्दरता के भान को जला तन के नश्वरता का ज्ञान ले आता हूँ ,

हाँ , मैं मणिकर्णिका शमशान बैठ आता हूँ 


जब भी  ह्रदय में जगा प्रेम - राग ,

उसमे वासना के उत्थान से पहले  उस वासना को मार आता हूँ ,

हाँ , मैं मणिकर्णिका शमशान बैठ आता हूँ 


जब होने लगता है जीवन सुख से अनुराग ,

जीवन को पुनः धर्म - कर्म पथ पर ले आता हूँ ,

हाँ , मैं मणिकर्णिका शमशान बैठ आता हूँ 


जब होने लगे जीवन में सुख - दुःख का भान ,

आत्मा को सुख में विरक्त और दुःख में सामान बना आता हूँ 

हाँ , मैं मणिकर्णिका शमशान बैठ आता हूँ 


जब जीवन में हो जाये प्रेरणा - आत्मविश्वाश का आकाल ,

चिता की आग से ही प्रेरणा - आत्मविश्वाश का दीप जला लाता हूँ ,

हाँ , मैं मणिकर्णिका शमशान बैठ आता हूँ 


- आकाश आर्यावर्त