Nov 30, 2020
ब्रह्मचर्य व वीर्य उर्ध्वगमन ( Brhmacharya & Sperm Upward Movement )
आज भारतवर्ष को हस्ट - पुष्ट और बलिष्ठ युवकों की परम आवयश्कता है |
आज राष्ट्र को आवश्यकता है ऐसे युवक और युवतियों की जिनके ह्रदय में धर्मोत्थान व् राष्ट्रोत्थान की प्रचंड भावना हो ,
जो राष्ट्र व् धर्म के लिए जीवन बलिदान करने को उद्दत हों !
आवश्यकता है ऐसे विद्यार्थियों की जो सदाचारी - चरित्रवान - संयमी - जितेन्द्रिय - मेघावी व् आत्मवान हों !
स्वामी विवेकानंद के शब्दों में
" हमारे देश के लिए इस समय आवयश्कता है ,
लोहे की तरह ठोस मांस - पेशियों और मजबूत स्नायु वाले शरीरों की ,
आवयश्कता है इस तरह से द्रढ़ इच्छा - शक्ति सम्पन्न होने की कि उसका कोई प्रतिरोध करने में समर्थ न हो ...
आवयश्कता है ऐसी अदम्य इच्छा - शक्ति व् ज्ञान की जो इस ब्रह्माण्ड के सारे रहस्यों को भेद सकती हो .......
मैं जो चाहता हूँ वह है ....प्रचंड बल - पुरुषार्थ - क्षात्रवीर्य - और ब्रह्मतेज "
( उनकी ये वाक्य बचपन से ही हमारा मार्गदर्शक रही हैं )
प्रचंड बल - क्षात्रवीर्य - ब्रह्मतेज तो ब्रह्मचर्य के अभाव में असंभव है .....अतः हमने बचपन से ही ब्रह्मचर्य नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करने का हरसंभव प्रयास किया है
वर्तमान में अधिकांशतः युवा ब्रह्मचर्य ज्ञान से विमुख होकर अपने ब्रह्मचर्य का नाश कर रहे हैं .....वीर्यपात या संभोग में परमानन्द ईश्वर ने इस लिए दिया की मानव जीवन को आगे बढ़ाना न भूल जाये किन्तु दुखद है की इस जीवन को आगे बढ़ाने वाली क्षमता व् ज्ञान का प्रयोग मानव क्षणिक आनंद के लिए करने लगा है और जीवन के सार तत्व का नाश कर रहा है |
जीवन के सार तत्व मानव शरीर संरचना अनुसार अलग - अलग हैं
जहां पुरुषों में जीवन सार तत्व वीर्य है ......तो स्त्री में जीवन सार तत्व रज है
एक बार हमने कुछ युवाओं को यह कुतर्क भी करते हुए देखा है की ...... अरे भाई वीर्य की जीवन आयु तो मात्र 47 से 90 दिन होती है
वो तो वैसे भी बरबाद हो जायेगा तो क्या दिक्कत है फलाना - धिमकना करने में
हमने उनसे पूछा -
" तुम्हारे शरीर में RBC की जीवन आयु 120 दिन है !
तुम्हारे शरीर में नाख़ून की जीवन आयु 55 - 80 दिन है !
तुम्हारे एक बाल की जीवन आयु 110 से 120 दिन है !
बर्बाद तो इनको भी हो जाना है ......क्यूँ नहीं अभी इन सबका फलाना - धिमकाना कर देते ? "
वास्तव में वीर्य या रज जीवन का सार तत्व है और इसके रक्षण व् ब्रह्मचर्य पालन मात्र से
स्नायु और मांस - पेशियों में बल मिलता है ...
शारीरिक - बौद्धिक - आत्मिक गुणों का विकास होता है ...
शरीर तेजोमय बन जाता है ....
जीवन आनंदमय बन जाता है ...
मुख मंडल पर आलौकिक आभा - ओज - तेज द्रिष्टिगोचर होने लगता है ...
स्मरण शक्ति विलक्षण हो जाती है ....
चेहरे पर लालिमा और गरिमा होती है ...
मृत्यु भय नहीं रहता ....
ह्रदय निर्भीक और पराक्रमी बन जाता है ....
वाणी में गंभीरता व् मोहकता आ जाती है ...
मेघा शक्ति प्रखर हो जाती है .....
स्वामी दयानंद सरस्वती - श्री भीष्म पितामह - स्वामी विवेकानंद इत्यादि महापुरुषों ने तो ब्रह्मचर्य पालन से मृत्यु को भी अपने वश में कर लिया था
" ब्रह्म्चारेंण तपसा देवा मृत्युम्पाधनत " ( अथर्व वेद ११ |५ |१९ )
अर्थात ब्रह्मचर्य रूपी तप से देव मृत्यु भी पार जाते हैं ....या ब्रहचर्य रूपी तप से विद्वान् मृत्यु को भी मार भगाते हैं
वर्तमान समय में पश्चात्य संस्कृति के व् शिक्षा परम्परा के प्रभाव से युवा पीढ़ी दिशाहीन हो चुकी है | उसका जीवन उद्देश्य मात्र अर्थोपार्जन व् देह तृप्ति तक ही सीमित रह गयी है |
विडम्बना तो यह है की माता - पिता - शिक्षक बोलते हैं की अध्ययन पर ध्यान दो .........किन्तु स्वयं उन्हें ध्यान पद्धति व् ध्यान विज्ञान का पता भी नहीं होता
अब ऐसी शिक्षा परम्परा पर हँसी तो आएगी ही न
वही हमारे गुरुकुलो में प्रथम पठन - पाठन का ध्येय ही प्रकृति व् आत्म ज्ञान से प्रारम्भ होता था | यह दुखद है की हमारी महान संस्कृति का पतन हो चूका है या उनका व्यवसायीकरण कर दिया गया है जहाँ विद्या का आदान - प्रदान भी स्वार्थ के आधार पर होता है न की धर्मोत्थान या आत्मोत्थान के लिए |
तथापि कुछ महान आत्माये हैं जो निर्जन वनों में सांसारिक माया से दूर अपनी ज्ञान की अविरल धारा बहा रहे हैं .....
ब्रह्मचर्य व् वीर्य उर्ध्वगमन
ब्रह्मचर्य वह विज्ञान है जो जीवन सार तत्व को रक्षित करने व् उसको उर्ध्वगमन कर कुण्डलिनी जागरण के बारे में बताती है |
कुण्डलिनी जागरण से पूर्व आधारभूत योग - आसन - ध्यान पर सिद्धि आवश्यक है ....( सिद्धि शब्द स्वयं में एक विस्तृत विज्ञान है )
जीवन सार तत्व अर्थात वीर्य / रज का उर्ध्वगमन स्वयं में एक श्रेष्ठ विज्ञान है |
जैसे - जैसे जीवन सार तत्व उर्ध्वगामी होता जाता है वैसे - वैसे कुण्डलिनी जागृत होती जाती है ...जिस कुण्डलिनी तक यह जीवन सार तत्व पहुच जाता है वह कुण्डलिनी जागृत हो जाती है व् उस कुण्डलिनी से सम्बन्धित शक्तियां भी जागृत हो जाती हैं
कुण्डलिनी चक्र में सहस्रार चक्र के जाग्रत हो जाने पर आत्मा सृष्टि में समाहित हो जाती है और उसका अभिन्न भाग बन जाती है .....स्वामी विवेकान्द का उदहारण किसे नहीं पता है
किन्तु कुण्डलिनी जागरण ना तो सामान्य स्थितियों में संभव है न सामान्य जगहों पर ....( हाँ आंशिक रूप से सक्रीय करना अलग बात है )
इन कुंडलियों के जागरण के लिए...
विशेष मन्त्रों
विशेष योग -आसन
विशेष ध्यान पद्धति
विशेष स्थान
इत्यादि का महत्पूर्ण स्थान है
उदहारण के तौर पर
मूलाधार चक्र जागरण
इस चक्र के जागरण के लिए निम्न बातो का ध्यान परम आवश्यक है ...
मन्त्र - लं
आसन - सिद्धासन
ध्यान - मूलाधार चक्र स्पन्दन
स्वांश पद्धति - दीर्घ
स्थान - शांत जल स्त्रोत ( सरोवर - तालाब इत्यादि )
आवृत्ति - १०००८
समय - अरुणोदय
इत्यादि इत्यादि .....विस्तृत जानकारी तो योग्य साधक को ही प्राप्त हो पायेगी क्यूंकि कुण्डलनी जागरण में आचार - विचार - आहार - जीवन शैली सभी में संतुलन व् समन्वय परम आवश्यक है
यही कारण है की योग्य साधक सदैव निर्जन वनों में ही पाए जाते हैं
वैज्ञानिक रूप से देखा जाये तो यह मानव के जीवन तरंग को साधने का अभ्यास है कुण्डलिनी जागरण ....जिसमें समय ,तापमान , अवस्था , स्थान इत्यादि का बारीकी से ध्यान रखना होता है
ठीक वैसे ही जैसे वैज्ञानिक प्रयोग में !
कुछ कुण्डलिनी के जागरण के लिए गुफाओं - झरनों - महाश्मशान - अग्नि - विशेष प्रकार के वृक्षों के इत्यादि पास विशेष प्रकार से साधना करनी होती है .......क्यूंकि आप अपने जीवन तरंगों को उच्च आयाम देते हैं और उच्चतम अवस्था में आपकी जीवन तरंग इस ब्रह्माण्ड में समाहित हो जाती है
वास्तव में आजकल तमाम पाखंडी खुद को ज्ञानी बताते फिरते हैं |
भले उन्होंने वेद तक का सही से अध्यन न किया हो और न समझा हो ....हाँ रटंत विद्या उनके पास अवश्य होती है किन्तु समझ बिलकुल शून्य
अब आप सोचेंगे की कैसे वृक्षों से जीवन तरंग का उत्थान संभव है ....तो इसके लिए हमने आपको वैज्ञानिक प्रयोग की व्यवस्था कर दी है जिसे देखकर आप समझ सकते हैं की वृक्षों में किस प्रकार की तरंगें होती हैं |
और आपको ध्यान हो तो महात्मा गौतम बुद्ध को ज्ञान वट वृक्ष के निचे ही मिला था
( Each and Every Thing in This World Has It's Specific Frequency (Energy) That Influence our Day Today Life By Creating it Or Destroying It .
That's Why Some Plant's With Frequency Equal To Our Body Frequency (Heart) are Beneficial and Some are Dangerous )
अंत में हम यही कहना चाहेंगे की ब्रह्मचर्य सर्वोच्च साधना है - सर्वोच्च विज्ञान है
और हमारे वेद - वेदांग - उपनिषद - पुराण श्रेष्ठ विज्ञान हैं ......किन्तु उन्हें समझ पाने के लिए योग्य व्यक्तित्व दुर्लभ है |
और हाँ यह सब ज्ञान हमें उस अनंत ब्रह्माण्ड से ही मिला है ....जिसका मै अभिन्न भाग हूँ ना की किसी पाखंडी या ढोंगी से .....किन्तु एक योगी का हम सदैव आभारी हैं जो हमें बाल्यकाल में ही मिले थे | हमने वैसे कई साधू - संतों - साधकों से बात की है और देखा है किन्तु उस योगी जैसा तेज और सम्मोहन युक्त व्यक्तित्व आजतक नहीं देखा और उसी के प्रोत्साहन से हमने बाल्यकाल में ही योग - ध्यान प्रारम्भ किया |
- आकाश आर्यावर्त

