Nov 5, 2020
" मांसाहार " एक निर्दयी - स्वार्थ पूर्ण भोजन ( Meat A Cruel - Selfish Food )
कल संध्या काल में हम कुछ साथियों के साथ भ्रमण पर निकले थे ( वैसे तो हम हमेशा अकेले ही निकलते हैं लोग खुद ही हमारे साथ आ जाते हैं जबकि हमें अकेले घूमना अधिक पसंद है ) ......प्रक्रति के गोद में उसके स्नेह और प्रेम को पाने के लिए
स्वभावतः जब हम चले तो कुछ दुरी पर वन मुर्गियों का परिवार दिखाई दे गया ......अत्यंत सुन्दर और मनमोहक !
हम उनके परिवार को और उनके बीच स्नेह को देखकर मन में बहुत प्रसन्न हो रहे थे तभी एक ने बोला इन्हें बहुत दिन बाद देखा है .....इनका स्वाद बहुत अच्छा होता है !
हमने बोला क्यों अपनी उंगली का स्वाद नहीं लिया क्या ......सबसे मीठा मांस तो मनुष्य का होता है ......आजमा कर देखो ......वैसे भी कीड़ों की संख्या से भी बदतर बढ़ रहे हैं !
वो बोला भाई तुम बहुत जज्बाती हो जाते हो !
हमने बोला - " तुम स्वाद के लिए क्यूँ किसी की जान लोगे "
"तुमको ये अधिकार किसने दिया है ? "
" तुमने किसी को जीवन दिया नहीं तो छिनने का अधिकार किसने दिया ! "
वैसे हम तो मांसाहारियों से दूर ही रहते हैं क्यूंकि जो स्वाद के लिए किसी की जान ले सकता है वो स्वार्थ सिद्धि के लिए क्या कुछ नहीं कर सकता !
जो भी हो उसके बाद हमने उन्हें तुरंत चले जाने को कहा ........वो सब बोले भाई आप तो बुरा मान गए !
बाद में सब चले गए और हम प्रकृति की गोद में बैठकर सोचने लगे की मनुष्य कितना स्वार्थी हो चूका है.....स्वाद तृप्ति के लिए जीव हत्या
जब भी कोई शाकाहारी जीव इस धरा पर जन्म लेता है तो उसकी आँखे खुली होती है ......
जैसे - गाय , भैस , बकरी ,गिलहरी इत्यादि
जबकि इसके विपरीत मांसाहारी-सर्वाहरी जीव की आंखे बंद होती है ..........
जैसे - सिंह , बाघ , लोमड़ी , भेड़िया आदि मांसाहारी जीव की आंखे बंद होती हैं
साथ ही भालू , बिल्ली , कुत्ता इत्यादी सर्वाहरी जीव की भी आंखे बंद होती हैं
किसी भी शाकाहारी जीव की आंत काफी लम्बी होती है क्यूंकि उसे पाचक तत्वों के अवशोषण में ज्यादा समय लगता है ......
जबकि मांसाहारी - सर्वाहरी जीव की आंते छोटी होती हैं क्यूंकि मांस ज्यादा लम्बी प्रक्रिया में जहरीला हो जाता है ......
जितने भी शाकाहारी जीव होते हैं वो भोजन को चबा कर खाते हैं ........
जबकि जितने भी मांसाहारी - सर्वाहरी जीव होते हैं वो भोजन को सीधे निगल जाते हैं........
जितने भी शाकाहारी जीव होते हैं वो होठों से पानी पिते हैं .....
जबकि जितने भी मांसाहारी - सर्वाहरी जीव होते हैं वो जीभ से पानी उछाल कर या जीभ से पानी पीते हैं ......
प्रश्न यह है की मनुष्य क्या है ?
प्रक्रति अनुसार व् धर्मानुसार तो मनुष्य शाकाहारी ही है !
किन्तु मुग़लों - पश्चिमी सभ्यता के परतंत्रता में हमने अपने प्राक्रतिक स्वाभाव को छोड़कर उनके सामान पाशविक या पैशाचिक प्रवित्ति अपना ली | ( भविष्य पुराण अनुसार यह होना भी स्वाभाविक है अतः यह कोई आश्चर्य की बात नहीं )
मूल प्रश्न हैं ....
क्या हम जिह्वा की तृप्ति के लिए जीव हत्या करें ?
क्या हम छुधा शांत करने के लिए जीव हत्या करें ?
क्या मानवता यही है की किसी की हत्या कर उसके पीड़ा - दर्द को भूलकर उसका भोजन करें ?
क्या यही मानवता है की हम इतने निर्दयी हो जाएँ की किसी मृत्यु से अपनी जिह्वा को तृप्त करें ?
क्या यही मानवता है की हम किसी निरपराध की हत्या अपने जिह्वा के लिए करें या करवाएं ?
क्या यही मानवता है की हम इतने स्वार्थी बन जाएँ की किसी निरीह - निरपराध जीव की हत्या अपने स्वाद तृप्ति के लिए होने दें ?
अगर यही मानवता है तो धिक्कार है ऐसी मानवता को !
अगर यही मानवता है तो धिक्कार है ऐसे मनुष्य को !
क्या ऐसे मनुष्य लायेंगे मानवता इस धरा पर ?
क्या ऐसे मनुष्य बचायेंगे मानवता को ?
मानवता तो वह है जो सभी जीव के आत्मा में आत्म दर्शन प्राप्त करे !
मानवता तो वह है जो सभी जीव के कष्ट को अपने कष्ट सामान माने !
मानवता तो वह है जो जीव को जीव से प्रेम करना सिखाये !
मानवता तो वह है जो जीव पर दया दिखाए !
( Promoting to non-veg food life style is well planned psychological warfare......can't elaborate all facts here )
हम जब भी ध्यान करते हैं .....पंछी , गिलहरियाँ हमारे पास आती हैं
कभी हमारे शरीर पर दौड़ लगाती हैं कभी फुदकती हैं .......हम उन्हें रोज पानी और दाना देते हैं ......कितना आनंद पूर्ण समय होता है वह !
ऐसा लगता है मनो सम्पूर्ण प्रकृति ही स्व अस्तित्व में समाहित हो रही हो वही कुछ पिशाच प्रवित्ति के लोगों को ये सुन्दर पंछी - गिलहरी - जीव भोजन दिखाई देते हैं |
