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Nov 4, 2020

माँ गंगा के पावन तट पर बैठा , हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं ( A True Love Poetry )

प्रात गंग की लहर है इठलाई सी   , मलय समीर है मुस्काया सा 

अरुणोदय में भानु भी है लालिमा लिए शर्माया सा 


 माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


लेखनी कर रही गुणगान प्रक्रति का कुछ यूँ मचल - मचल कर ,

जैसे करवल करते ये प्रवासी पक्षी मस्त - मगन हो कर 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


अविरल धारा  सिखा रही है , कर्म पथ पर बहते जाओ - बढ़ते जाओ 

हर लहर बता रही है , स्वयं में ही अपना अस्तित्व गढ़ते जाओ - रचते जाओ 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


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वो जो बहता मृत तन जा रहा है , तन के नश्वरता का ज्ञान बता रहा 

वो जो लहर उसे बहा रही है , प्रक्रति के काल चक्र का पथिक मात्र होने का ज्ञान सिखा रही है 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


हर स्पर्श शीतल समीर का , रोमांचक  चैतन्यता सी ह्रदय में ला रही है 

प्रकृति ही है मेरी प्रेयसी , यह बोलकर लहरे भी प्रेम से इठला रही हैं 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


तरुण  सूर्य की हर प्रातः रश्मि , मन में स्निग्धता सी जगा रही है ,

प्रकृति के  निश्छल -निःस्वार्थ अर्पित  प्रेम का  यथार्थ अनुभव करा रही है 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


प्रकृति की यह अप्रितम सुन्दरता  , ह्रदय को प्रेम - पाश में फसा रही है 

ह्रदय का यह अवर्णनीय रोमांचक  भाव , प्रक्रति के के स्नेह - प्रेम - राग में  डूबा रही है 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


कभी प्रेयसी सी लहरें अपने शीतलता से पैरों को छेड़ रही हैं ,

कभी ये पवन की शीतल  लहरें चेहरे को मधुर स्पर्श देकर एक प्रेयसी सी मधुर गीत सुना रही हैं 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


कभी कोई पवन का झोंका प्रेयसी सी  बालों को सहला रही हैं ,

कभी कोई पंछी प्रेयसी की भांति  मेरे दानों में  से अपने अधिकार के दाने चुरा रहा रही  है 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


अभी आयी थी वह सुनहली मछली जो गयी पैरों को छूकर , जैसे जाती हो कोई प्रियतमा प्रिय के ह्रदय को छूकर 

वह आस - पास ही है कहीं , किन्तु एक प्रेयसी सी मन में शरारत लिए कहीं मौन है इस जल रूपी जीवन में 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  


किंचित अचंभित हूँ मै किन्तु प्रक्रति के स्थिर - अचल प्रेम में   प्रसन्नचित्त भी हूँ मैं ,

कितना निःस्वार्थ - समर्पित - सत्य सी है यह मेरी प्रेयसी 

हे प्रक्रति !

तुम्हारा ही था - तुम्हारा ही हूँ मैं - तुम्हारा ही है रहना 

क्यूंकि अचल - अविनाशी - अनंत तुम्हारा ही प्रेमी हूँ मैं 


माँ  गंगा के पावन तट पर बैठा   ,

हर्षित हूँ मैं - पुलकित हूँ मैं  



- आकाश आर्यावर्त ( अस्सी घाट पर रचित कविता )


( वैसे तो अस्सी घाट हमारे घर से पांच किलोमीटर की दुरी पर है , लेकिन मन को जो आनंद वहाँ सुबह बैठकर बहती लहर को देखने में आता है वो इस संसार में कहीं भी नहीं है 

तो अपनी रामप्यारी के साथ यानि की हमारी सायकल के साथ ये सफ़र शुरू होता है और घाट पर बैठने के बाद हमारा हमसफ़र बन जाती हैं हमारी लेखनी - हमारी रचना और यह सफ़र तब तक चलता है जब तक शरीर के  हर रोयें  - रोयें में प्रेम उतर न जाये.......फिर क्या पूछना हम हवाओं के साथ नाच भी लेते हैं और लहरों के साथ उछल भी लेते हैं ......वो कहते हैं न की प्रेम वही जिसमे हम अपने अस्तित्व को भूल जाएँ और एक हो जाएँ ...........तो हम तो भूल जाते हैं अपने आप को और खो जाते हैं अपने प्रक्रति के अस्तित्व में ही..........ये वो प्रेम है जो हमेशा से वैसा ही है जब से हमने वहां जाना शुरू किया था ......और अब भी वैसा ही है ......स्थिर - अचल ! )