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Oct 15, 2020

मैं या हम .....क्या है एक मानव तन का अस्तित्व

आजकल ज्यादातर स्थानों पर लोग अपने अस्तित्व को व्यक्त करने के लिए मैं शब्द का प्रयोग करते हैं जैसे की 

मेरा नाम ....

मेरा घर ....

मेरे पिता ....

इत्यादि - इत्यादि 

क्योंकि सामान्यतः व्यक्ति यही समझता है की उसके  शरीर या उसके अस्तित्व में किसी और का या किसी तत्व का कोई योगदान नहीं है | यह स्वार्थपूर्ण या अहंकारपूर्ण  विचारधार हमारी संस्कृति के विनाश से और पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से ही उत्पन्न हुई है | यही स्वार्थपूर्ण शिक्षा और संस्कृति हमारे पृथ्वी का सर्वनाश कर रही है |


अब किस तरह कर रही है ....आईये समझते हैं 


गुरुकुल  में कोई विद्यार्थी अपना परिचय " हम "  शब्द के साथ देता है | क्यूंकि उसे उसके वास्तविक अस्तित्व का पता होता है | उसे यह ज्ञात होता है कि.......


उसका अस्तित्व वृक्षों के दिए प्राणवायु से है ,


उसका अस्तित्व प्रक्रति के दिए जल से है ,


उसका अस्तित्व सूर्य के दिए प्रकाश से है,

 

उसका अस्तित्व  माँ वसुंधरा के दिए मिटटी से है ,


उसका अस्तित्व अनंत आकाश से है ,


वह स्वयं को मै कहकर प्रक्रति के उपकारों को अपमानित नहीं कर सकता | इसलिए वह स्वयं को हम कहकर बुलाता है |

स्वयं के अलावा अन्य व्यक्ति के होने पर हमलोग शब्द प्रयोग होता है |

हम अर्थात वह व्यक्ति पंचतत्वों के प्रति अपने उत्तरदायित्व को लेकर सजग है | वह व्यक्ति समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को लेकर सजग है |

प्रश्न यह है की क्या आज के आधुनिक समाज में यह ज्ञान भी शेष रह गया है की व्यक्ति का वास्तविक अस्तित्व क्या है ?

उसके स्वस्तित्व का आधार क्या है ?


उसका उसके स्वस्तित्व के आधार घटक के प्रति उत्तरदायित्व क्या है ?


स्वस्तित्व के ज्ञान के आभाव में लोग अहंकार भावना - स्वार्थ भावना से लिप्त होते जा रहें हैं और मानव जीवन पतन - अनाचारी  - अमर्यादित  होता जा रहा है | 


मानव सभ्यता  को पतन से बचने का एकमात्र उपाय मानव को उसके स्वस्तित्व का ज्ञान हो जाना है ...........परन्तु पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव में यह संभव नहीं |


- आकाश आर्यावर्त